मानवता हुई शर्मसार — मां की लाश लेने से बेटे का इनकार, चार दिन बाद शादी… बुजुर्ग पिता की आंखों में दर्द और समाज के लिए सवाल

राजकुमार

“नहीं… हमें लाश नहीं चाहिए।” यह सुनकर वृद्ध पिता वहीं जमीन पर बैठकर रो पड़े। वहां मौजूद लोग भी इस हृदय विदारक दृश्य से सहम गए।

कैसे बदला परिवार — ‘बोझ’ कहकर घर से निकाला था
भुआल गुप्ता का परिवार कभी खुशहाल था। लेकिन समय के साथ बेटों का व्यवहार बदलता गया। एक साल पहले बड़ा बेटा संजय ने मां-बाप को घर से निकालते हुए कहा था—

आहत दंपती ने अपमान और अकेलेपन में आत्महत्या करने की कोशिश की, पर एक राहगीर ने उन्हें बचाया और उन्हें सहारा दिलाने की बात कही। इसके बाद वे अयोध्या और मथुरा में भटकते रहे और अंत में जौनपुर के वृद्धाश्रम पहुंचे, जहां उन्हें देखभाल और भोजन मिला।

“हमने इन्हें सेवा समझकर रखा, मगर बेटे ने मां को बोझ कह दिया। दुख यह नहीं कि वह आया नहीं… दुख यह है कि उसने इंसान होना छोड़ दिया।”

क्या मां-बाप सिर्फ चलने-फिरने लायक होने तक ही हमारे होते हैं?

क्या शादी की खुशियां बुजुर्गों के अंतिम संस्कार से बड़ी हैं?

क्या आधुनिकता की दौड़ में संवेदनाएं मर चुकी हैं?

भुआल गुप्ता आज अकेले हैं—पत्नी को खो दिया, बेटे को खो दिया और समाज पर भरोसा भी।

लेकिन एक बात जरूर है…

मां की लाश ठुकराने वाला बेटा शायद शादी में खुश होगा—पर क्या वो कभी आईने में अपनी आंखों में इंसानियत ढूंढ पाएगा?

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