एडवोकेट शुभम भारद्वाज
हरिद्वार में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर जहां नगर क्षेत्र में वर्षों से झुग्गी-झोपड़ी बनाकर जीवन यापन कर रहे गरीब और मजदूर तबके के लोगों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर गंगा घाट पर खुलेआम किए गए बड़े अतिक्रमण पर विभागीय चुप्पी कई संदेहों को जन्म दे रही है।
जानकारी के अनुसार, गंगा घाट पर अतिक्रमण कर बनाया गया “सवेरा होटल एवं रेस्टोरेंट” न केवल नियमों का उल्लंघन कर रहा है, बल्कि सीधे तौर पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की नियमावली को भी ताक पर रखे हुए है। इसके बावजूद संबंधित विभाग के अधिकारी इस ओर कोई ठोस कार्रवाई करते नजर नहीं आ रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, उक्त होटल में बनाए गए कमरों का किराया लगभग ₹5,000 प्रति दिन बताया जा रहा है, जिससे प्रतिदिन भारी मुनाफा कमाया जा रहा है। आरोप है कि यह पूरा निर्माण गंगा घाट की भूमि पर अवैध रूप से किया गया है, जो कि उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के अधीन आती है।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि सिंचाई विभाग द्वारा इस अतिक्रमण को हटाने के लिए कई बार नोटिस जारी किए जा चुके हैं, लेकिन आज तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। सवाल यह उठता है कि जब नोटिस दिए जा चुके हैं तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या प्रभावशाली लोगों के दबाव में नियमों को नजरअंदाज किया जा रहा है?
इसके उलट, हाल ही में अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीब झुग्गी-झोपड़ीवासियों की झुग्गियों पर बुलडोजर चला दिया गया, जिससे कई परिवार बेघर हो गए। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन का रवैया गरीबों के प्रति सख्त और रसूखदारों के प्रति नरम दिखाई दे रहा है।
समाजसेवियों और स्थानीय नागरिकों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि वास्तव में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होनी है, तो वह बिना भेदभाव के होनी चाहिए। गंगा जैसी पवित्र नदी के तट पर हो रहे अवैध निर्माण न केवल पर्यावरण के लिए खतरा हैं, बल्कि कानून व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन और संबंधित विभाग इस कथित बड़े अतिक्रमण पर कब और क्या कार्रवाई करते हैं, या फिर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई केवल गरीबों तक ही सीमित रह जाएगी।
