राजकुमार
गोरखपुर: रिश्तों का दर्दनाक सच एक बार फिर देश के सामने आया है। गोरखपुर के कैंपियरगंज क्षेत्र में ऐसी घटना घटी जिसने इंसानियत को झकझोर दिया। यहां एक बेटे ने अपनी ही मां के शव को लेने से केवल इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि घर में शादी थी और उसे लगा कि मां की मौत से “अपशकुन” हो जाएगा।
चार दिन तक वृद्धाश्रम में रखी रही लाश
जानकारी के मुताबिक, मृत महिला और उनके पति पिछले कई महीनों से जौनपुर के एक वृद्धाश्रम में रह रहे थे। बुजुर्ग महिला की मौत के बाद आश्रम संचालक और वहां मौजूद अन्य लोगों ने बेटे को फोन पर सूचना दी, लेकिन उसने साफ शब्दों में कहा—
“शादी है… अपशकुन होगा… मैं शव नहीं ले सकता।”
चार दिन तक मृत महिला का शव वृद्धाश्रम में रखा रहा। पति भुआल गुप्ता हाथ जोड़कर बेटे से मृत पत्नी को ले जाने की गुहार लगाते रहे, लेकिन बेटे का दिल न पसीजा।
रोते-रोते पिता बोले — ‘कम से कम अंतिम विदाई तो दे देता…’
जब आश्रम कर्मचारियों ने अंतिम बार बेटे से बात कराई तो बुजुर्ग पिता फूट पड़े। कांपती आवाज में उन्होंने कहा—
“बेटा, अपनी मां को आखिरी बार देख लो… उसे अकेला मत छोड़।”
लेकिन दूसरी तरफ से ठंडा जवाब आया—
“नहीं… हमें लाश नहीं चाहिए।” यह सुनकर वृद्ध पिता वहीं जमीन पर बैठकर रो पड़े। वहां मौजूद लोग भी इस हृदय विदारक दृश्य से सहम गए।
रिश्तेदारों ने दफना दी लाश — अंतिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ
जब चार दिनों तक कोई परिवारजन नहीं आया, तो आश्रम प्रशासन और दूर के कुछ रिश्तेदारों ने मिलकर महिला को घाट किनारे दफना दिया। इस दौरान बुजुर्ग पिता बार-बार बस एक ही बात कहते रहे—
“यह तो मिट्टी में पड़ेगी… कीड़े पड़ जाएंगे… वह चाहती थी चिता… पर बेटों ने उसकी आखिरी इच्छा भी छीन ली…”
वृद्ध पिता की आंखों में आंसू नहीं, सवाल था—क्या शादी शव से ज्यादा जरूरी थी? क्या मां का अस्तित्व केवल अपशकुन था?
कैसे बदला परिवार — ‘बोझ’ कहकर घर से निकाला था
भुआल गुप्ता का परिवार कभी खुशहाल था। लेकिन समय के साथ बेटों का व्यवहार बदलता गया। एक साल पहले बड़ा बेटा संजय ने मां-बाप को घर से निकालते हुए कहा था—
“अब तुम दोनों हमारे किसी काम के नहीं।”
आहत दंपती ने अपमान और अकेलेपन में आत्महत्या करने की कोशिश की, पर एक राहगीर ने उन्हें बचाया और उन्हें सहारा दिलाने की बात कही। इसके बाद वे अयोध्या और मथुरा में भटकते रहे और अंत में जौनपुर के वृद्धाश्रम पहुंचे, जहां उन्हें देखभाल और भोजन मिला।
वृद्धाश्रम संचालक बोले — ‘हमने मां-बाप को भगवान समझा, लेकिन बेटे ने क्या समझा?’
आश्रम संचालक रवि कुमार चौबे ने कहा—
“हमने इन्हें सेवा समझकर रखा, मगर बेटे ने मां को बोझ कह दिया। दुख यह नहीं कि वह आया नहीं… दुख यह है कि उसने इंसान होना छोड़ दिया।”
समाज के लिए सवाल
इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या मां-बाप सिर्फ चलने-फिरने लायक होने तक ही हमारे होते हैं?
क्या शादी की खुशियां बुजुर्गों के अंतिम संस्कार से बड़ी हैं?
क्या आधुनिकता की दौड़ में संवेदनाएं मर चुकी हैं?
भुआल गुप्ता आज अकेले हैं—पत्नी को खो दिया, बेटे को खो दिया और समाज पर भरोसा भी।
लेकिन एक बात जरूर है…
मां की लाश ठुकराने वाला बेटा शायद शादी में खुश होगा—पर क्या वो कभी आईने में अपनी आंखों में इंसानियत ढूंढ पाएगा?
