एडवोकेट शुभम भारद्वाज
हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में एक बार फिर सरकारी भूमि को कौड़ियों के भाव सौंपने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। सिंचाई विभाग की करोड़ों रुपये मूल्य की कीमती भूमि को मात्र 1250 रुपये प्रतिमाह के किराए पर पूरे 29 वर्षों के लिए दिए जाने का खुलासा हुआ है। यह पूरा खेल इतना सुनियोजित और चालाकी से रचा गया कि लंबे समय तक विभागीय अधिकारियों को भी इसकी भनक तक नहीं लगी। सूत्रों के अनुसार, इस भूमि को किराए पर लेने में दिल्ली के एक हाई-प्रोफाइल बिल्डर का नाम सामने आया है, जबकि इस सौदे को जमीन पर उतारने और रास्ता दिखाने में हरिद्वार के एक प्रभावशाली महंत की भूमिका की चर्चा जोरों पर है। मामला सामने आते ही विभागीय गलियारों में हड़कंप मच गया है।
करोड़ों की सरकारी जमीन, 1250 रुपये का किराया!
स्थानीय लोगों के अनुसार, जिस भूमि को किराए पर दिया गया है, उसका बाजार मूल्य करोड़ों रुपये में है। यदि नियमानुसार नीलामी या व्यावसायिक दरों पर किराया तय किया जाता, तो सरकार को हर महीने लाखों रुपये का राजस्व मिल सकता था।
लेकिन विभागीय फाइलों में इस जमीन का किराया मात्र 1250 रुपये प्रतिमाह दर्शाकर 29 साल के लिए अनुबंध कर दिया गया।
यह सवाल अब हर जुबान पर है कि आखिर किस नियम, किस आधार और किस मंशा से इतना बड़ा फैसला लिया गया?
सरकारी जमीन पर दुकानें और कमर्शियल निर्माण
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि किराए पर ली गई इस सरकारी भूमि पर चोरी-छिपे दर्जनो दुकानों का निर्माण किया जा रहा था। निर्माण कार्य इस तरह चल रहा था मानो जमीन निजी हो और किसी बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट का हिस्सा हो।
बताया जा रहा है कि यदि समय रहते शिकायत न होती, तो करोड़ों रुपये का स्थायी निर्माण खड़ा कर दिया जाता और बाद में उसे हटाना लगभग असंभव हो जाता।
शिकायत के बाद जागा विभाग
मामले की शिकायत जब विभाग के उच्चाधिकारियों तक पहुँची, तब जाकर विभाग हरकत में आया।
उच्चस्तरीय निर्देशों के बाद विभागीय टीम ने मौके पर पहुँचकर जांच की और तत्काल निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।
RTI में भी गड़बड़ी, खसरा नंबर गलत!
मामले में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
सूत्रों के अनुसार, यह भूमि फॉरेस्ट लैंड के बेहद नजदीक स्थित है और प्रथम दृष्टया सिंचाई विभाग की भूमि प्रतीत होती है।
लेकिन जब इस संबंध में RTI के माध्यम से अभिलेख प्राप्त किए गए, तो उनमें खसरा नंबर गलत दर्शाए गए पाए गए। आरोप है कि जानबूझकर गलत खसरा नंबर दिखाकर विभाग की आंखों में धूल झोंकी गई, ताकि भूमि की वास्तविक स्थिति और स्वामित्व छिपाया जा सके।
