राजकुमार
हरिद्वार। श्यामपुर रेंज एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। सजनपुर बीट के जंगलों में जहरीला पदार्थ खिलाकर दो बाघों की निर्मम हत्या किए जाने का मामला अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन चुका है। इस सनसनीखेज खुलासे ने न सिर्फ वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोली है, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली, निगरानी तंत्र और जंगलों में लगातार बढ़ रही अवैध गतिविधियों पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
वन विभाग के अनुसार, श्यामपुर रेंज के सजनपुर बीट स्थित कम्पार्टमेंट संख्या-09 में सर्च ऑपरेशन के दौरान बाघों के शव और एक मृत भैंस बरामद हुई। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने पहले मृत भैंस के शव पर खेतों में इस्तेमाल होने वाला जहरीला रसायन छिड़का और उसे जंगल में छोड़ दिया। जैसे ही बाघिन और उसके दो शावकों ने मांस खाया, उनकी हालत बिगड़ गई और दो बाघों की मौत हो गई। इसके बाद आरोपियों ने शवों के पंजे और पैर काटकर उन्हें बेचने की तैयारी शुरू कर दी।
वन विभाग की कार्रवाई, लेकिन सवाल बरकरार
मामले में वन विभाग ने आलम उर्फ फम्मी पुत्र शमशेर निवासी गुर्जर डेरा को गिरफ्तार किया है, जबकि मुख्य आरोपी आमिर हमजा उर्फ मियां अभी फरार बताया जा रहा है। चार आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है। वन विभाग का दावा है कि आरोपी बाघों के पंजे, नाखून और अन्य अंग दिल्ली में बेचने की तैयारी में थे।
घटना की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने श्यामपुर रेंज अधिकारी विनय राठी का चार्ज हटाकर उन्हें डीएफओ कार्यालय से संबद्ध कर दिया है। वहीं चिड़ियापुर रेंज अधिकारी महेश शर्मा को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। डीएफओ स्वप्निल अनिरुद्ध ने विभागीय जांच जारी होने की बात कही है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी घटना होने तक विभाग करता क्या रहा?
शिकायतें होती रहीं… जंगलों में बढ़ता रहा कब्जा

स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि श्यामपुर रेंज के जंगलों में लंबे समय से अवैध गतिविधियां चल रही थीं। जंगलों में लगातार टीनशेड डालकर कब्जे किए जा रहे थे, वन क्षेत्र में बड़े स्तर पर शादी समारोह आयोजित हो रहे थे, डीजे और भारी भीड़ से वन्यजीवों का प्राकृतिक वातावरण प्रभावित हो रहा था, लेकिन विभाग मौन बना रहा। सूत्रों के अनुसार, कुछ समय पहले हजारों लोगों की मौजूदगी वाली एक बड़ी शादी की शिकायत डीएफओ हरिद्वार से की गई थी। आरोप है कि शिकायत के बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। जंगलों में अवैध निर्माण, पशुओं की बढ़ती संख्या और संदिग्ध गतिविधियों की लगातार सूचनाएं मिलने के बाद भी विभाग की ओर से कठोर कदम नहीं उठाए गए।
“जंगल में किसका राज?”
वन क्षेत्र में रहने वाले वन गुर्जरों को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि कई परिवारों के पास दर्जनों नहीं बल्कि सैकड़ों गाय-भैंस हैं। जंगलों में भारी मात्रा में पशुपालन कहीं न कहीं वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर वन क्षेत्र में एक परिवार को कितने पशु रखने की अनुमति है? क्या कभी वास्तविक सत्यापन हुआ? क्या विभाग के पास पशुओं का रिकॉर्ड मौजूद है? यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
सूत्रों में यह चर्चा भी तेज है कि जंगलों से निकलने वाला दूध और घी बड़े स्तर पर विभिन्न विभागों तक पहुंचता है, जिसके चलते कथित तौर पर कई मामलों में आंखें मूंद ली जाती हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
शादियों में परोसे गए मीट पर भी सवाल
घटना के बाद अब यह सवाल भी उठ रहा है कि जंगलों में आयोजित होने वाले बड़े समारोहों और शादियों में परोसे जाने वाले मीट की क्या कभी जांच हुई? क्या अधिकारियों ने कभी यह सुनिश्चित किया कि वन्यजीवों का शिकार कर उनका मांस इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा?
वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि जंगलों में लगातार बढ़ती मानवीय गतिविधियां और अवैध कब्जे वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। अत्यधिक पशुपालन और मानव दखल से बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास लगातार प्रभावित हो रहा है।
खबरों का हुआ असर, विभाग हरकत में
बताया जा रहा है कि लगातार वेब पोर्टलों और अखबारों में वन विभाग की लापरवाही उजागर होने के बाद विभाग हरकत में आया। मीडिया में जंगलों में कब्जे, अवैध टीनशेड, डीजे शोर-शराबा और वन्यजीवों पर बढ़ते खतरे की खबरें लगातार प्रकाशित हो रही थीं।
अब विभाग ने मामले की जांच तेज कर दी है और फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए विशेष टीमें गठित की गई हैं। आरोपी आमिर हमजा उर्फ मियां ने रोशनाबाद स्थित सीजेएम कोर्ट में सरेंडर अर्जी भी दाखिल की है।
सबसे बड़ा सवाल…
अगर जंगलों में अवैध कब्जे हो रहे थे, भारी संख्या में पशुपालन चल रहा था, शिकायतें लगातार मिल रही थीं, संदिग्ध गतिविधियों की सूचनाएं पहले से थीं और वन्यजीवों पर खतरा मंडरा रहा था — तो आखिर विभाग ने समय रहते सख्त कदम क्यों नहीं उठाए?
दो बाघों की दर्दनाक मौत ने केवल वन्यजीव तस्करी का मामला नहीं खोला, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या जंगल अब अपराधियों और तस्करों के लिए सुरक्षित अड्डा बनते जा रहे हैं? और यदि हां, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है!
