राजकुमार
हरिद्वार। वन प्रभाग की श्यामपुर रेंज के जंगल में दो वर्षीय नर बाघ का क्षत-विक्षत शव मिलने से पूरे वन महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। बाघ के चारों पैर कटे मिले, जबकि खाल और दांत सुरक्षित पाए गए। प्रारंभिक जांच में मामला सुनियोजित शिकार और वन्यजीव तस्करी से जुड़ा माना जा रहा है। लेकिन इस सनसनीखेज घटना ने केवल वन्यजीव अपराध ही नहीं, बल्कि वन विभाग की कार्यशैली और कथित लापरवाही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वन विभाग के अनुसार सजनपुर बीट, कम्पार्टमेंट संख्या-09 में सर्च ऑपरेशन के दौरान बाघ का शव बरामद किया गया। मौके पर एक मृत भैंस भी मिली, जिसके आधार पर आशंका जताई जा रही है कि बाघ को जहरीला मांस खिलाकर मौत के घाट उतारा गया। बताया जा रहा है कि आरोपियों ने पहले जंगल में मृत भैंस डालकर उस पर जहरीला पदार्थ छिड़का, और जैसे ही बाघ ने मांस खाया, उसकी मौत हो गई। इसके बाद उसके चारों पैर काट लिए गए। मामले में वन विभाग ने आलम उर्फ फम्मी पुत्र शमशेर निवासी गुर्जर डेरा को गिरफ्तार किया है, जबकि दूसरा आरोपी आमिर हमजा उर्फ मियां फरार बताया जा रहा है। उसकी तलाश में लगातार दबिश दी जा रही है।
सवालों के घेरे में वन विभाग
इस घटना के बाद स्थानीय लोगों और वन्यजीव प्रेमियों में भारी आक्रोश है। आरोप है कि श्यामपुर और आसपास के वन क्षेत्रों में लंबे समय से अवैध गतिविधियां चल रही थीं, लेकिन विभाग आंखें मूंदे बैठा रहा। सूत्रों के अनुसार, कुछ समय पूर्व वन क्षेत्र में बड़े स्तर पर वन गुर्जरों द्वारा शादी समारोह आयोजित किए गए थे, जिनमें हजारों लोगों की मौजूदगी की शिकायत डीएफओ हरिद्वार से की गई थी। आरोप है कि शिकायतों के बावजूद विभाग ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इतना ही नहीं, जंगलों में लगातार टीनशेड डालकर स्थायी कब्जे किए जाने, अवैध निर्माण और पशुओं की संख्या बढ़ने की शिकायतें भी लंबे समय से उठती रही हैं। लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होने के आरोप लग रहे हैं।
जंगलो में किसकी सरकार?”
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि कई वन गुर्जर परिवारों के पास दर्जनों नहीं बल्कि सैकड़ों गाय-भैंस हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर वन क्षेत्र में इतने बड़े स्तर पर पशुपालन की अनुमति कैसे दी जा रही है? क्या विभाग के पास इसका कोई वास्तविक रिकॉर्ड है? क्या कभी पशुओं की गणना या सत्यापन हुआ? वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में अत्यधिक पशुपालन से बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित होता है। वहीं, पशुओं के माध्यम से बीमारियां और मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बढ़ता है।
क्या आयोजन में परोसे जाने वाले मीट की कभी हुई जांच?”
घटना के बाद एक और गंभीर सवाल चर्चा में है — वन क्षेत्रों में होने वाले बड़े आयोजनों और शादियों में परोसे जाने वाले मीट की क्या कभी किसी अधिकारी ने जांच करवाई? क्या यह सुनिश्चित किया गया कि वन्यजीवों का शिकार कर उनका मांस तो इस्तेमाल नहीं किया जा रहा?
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन बाघ की मौत के बाद ऐसे सवाल अब और तेज हो गए हैं।
बड़ा सवाल…
अगर जंगल में लगातार अवैध गतिविधियां चल रही थीं, शिकायतें मिल रही थीं, पशुओं की संख्या बढ़ रही थी, कब्जे हो रहे थे और संदिग्ध गतिविधियों की सूचनाएं पहले से थीं — तो आखिर वन विभाग ने समय रहते सख्त कदम क्यों नहीं उठाए?
बाघ की मौत ने केवल एक वन्यजीव की हत्या का मामला नहीं खोला, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या जंगल अब तस्करों और अवैध गतिविधियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनते जा रहे हैं?
