हरिद्वार:- डीएम के निर्देशों को नहीं मान रहे अधिकारी? गंगा तट के कथित अतिक्रमण पर खामोशी,सवेरा होटल पर अधिकारी मौन

हरिद्वार। जनपद में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई लगातार जारी है। प्रशासन द्वारा सरकारी भूमि, ग्राम समाज, तालाबों और नहरों पर किए गए अवैध कब्जों को हटाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। हाल ही में जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने भी स्पष्ट किया है कि कुंभ और कांवड़ यात्रा से पहले सरकारी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराया जाएगा तथा दोबारा अवैध कब्जा होने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाएगी।

लेकिन इस कार्रवाई के बीच प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल भी खड़े होने लगे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जहां एक ओर गरीब, मजदूर और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों के खिलाफ लगातार बुलडोजर कार्रवाई की जा रही है, वहीं दूसरी ओर प्रभावशाली लोगों द्वारा किए गए कथित बड़े अतिक्रमणों पर संबंधित विभागों की चुप्पी समझ से परे है।

मामला हरिद्वार के गंगा घाट क्षेत्र से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां स्थानीय लोगों के अनुसार “सवेरा होटल एवं रेस्टोरेंट” द्वारा कथित रूप से अतिक्रमण कर निर्माण किया गया है। आरोप है कि यह निर्माण गंगा तट से जुड़े पर्यावरणीय नियमों और एनजीटी के दिशा-निर्देशों के विपरीत है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।

सूत्रों का दावा है कि सिंचाई विभाग की ओर से समय-समय पर नोटिस भी जारी किए गए, लेकिन नोटिसों के बाद भी कार्रवाई फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी। इससे यह सवाल उठ रहा है कि जब विभाग स्वयं नोटिस जारी कर चुका है तो फिर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या नियम केवल कमजोर वर्ग के लोगों पर लागू होते हैं या फिर प्रभावशाली लोगों के लिए अलग व्यवस्था है?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस मामले को लेकर नगर निगम, सिंचाई विभाग और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पोर्टल पर भी शिकायतें दर्ज कराई जा चुकी हैं, लेकिन शिकायतों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। इससे लोगों में नाराजगी बढ़ रही है और प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।

समाजसेवियों का कहना है कि यदि सरकार और प्रशासन वास्तव में अतिक्रमण मुक्त अभियान चला रहे हैं तो कार्रवाई बिना किसी भेदभाव के होनी चाहिए। गंगा तट पर होने वाले किसी भी अवैध निर्माण का प्रभाव केवल सरकारी भूमि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पर्यावरण, नदी संरक्षण और धार्मिक आस्था से भी जुड़ा होता है।

जिलाधिकारी द्वारा सभी सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की घोषणा के बाद अब लोगों की निगाहें इस कथित बड़े अतिक्रमण पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि संबंधित विभाग और प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाते हैं, या फिर अतिक्रमण विरोधी अभियान केवल गरीबों और झुग्गी-झोपड़ीवासियों तक ही सीमित रह जाएगा।

फिलहाल जनता एक ही सवाल पूछ रही है—क्या कानून सबके लिए बराबर है, या फिर कार्रवाई का बुलडोजर केवल कमजोरों के दरवाजे तक ही पहुंचता है?

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