राजकुमार
हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में एक ओर मांस की दुकानों को लेकर वर्षों से विवाद और विरोध होता रहा है, वहीं दूसरी ओर एक गंभीर सवाल प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़ा हो रहा है। जनपद हरिद्वार में कोई अधिकृत स्लॉटर हाउस संचालित नहीं है, इसके बावजूद शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकन और मटन की दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं तथा कई स्थानों पर खुलेआम मांस काटकर बेचा जा रहा है।
सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब जनपद में वैध स्लॉटर हाउस ही नहीं है, तो आखिर दुकानों तक पहुंचने वाला चिकन और मटन कहां से आ रहा है? यदि यह अन्य जनपदों या राज्यों से लाया जा रहा है, तो क्या खाद्य सुरक्षा विभाग ने कभी बड़े स्तर पर अभियान चलाकर दुकानदारों से खरीद के बिल, परिवहन दस्तावेज और स्रोत संबंधी अभिलेखों की जांच की है?
लोगों का आरोप है कि खाद्य सुरक्षा विभाग की उदासीनता के कारण इस पूरे मामले की कभी गंभीरता से जांच नहीं हुई। विभाग समय-समय पर खाद्य पदार्थों के सैंपल लेने और निरीक्षण की बात तो करता है, लेकिन मांस की दुकानों पर बिक रहे उत्पादों के स्रोत और वैधता की जांच को लेकर कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आती।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि मांस वैध स्रोत से आ रहा है तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते? और यदि बिना वैध दस्तावेजों के बिक्री हो रही है तो संबंधित विभागों द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?
नगर निगम क्षेत्र में मांस की दुकानों को स्थानांतरित करने के लिए प्रस्ताव पारित होने के बावजूद अधिकांश दुकानें पूर्ववत संचालित हैं। इससे प्रशासनिक निर्णयों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जनता का कहना है कि खाद्य सुरक्षा विभाग, नगर निगम, पशुपालन विभाग और जिला प्रशासन को संयुक्त अभियान चलाकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि जनपद हरिद्वार में बिक रहा चिकन और मटन किस स्रोत से आ रहा है, क्या उसके पास वैध बिल और स्वास्थ्य प्रमाणन है तथा क्या उसकी बिक्री निर्धारित नियमों के अनुरूप हो रही है।
बड़ा सवाल
जब हरिद्वार में एक भी स्लॉटर हाउस नहीं है, तो रोजाना बिकने वाला चिकन और मटन कहां से आ रहा है? और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो खाद्य सुरक्षा विभाग अब तक इसकी पारदर्शी जांच और सार्वजनिक जानकारी क्यों नहीं दे पाया?
